Tuesday, 13 March 2012

Siyast ke chakke panje

  बच्चे राजनीति राजनीति खेल रहे थे।
                मैंने देखा कुछ बच्चे राजनीति राजनीति खेल रहे थे। देख कर मुझे कई आष्चर्य हए। पहला आष्चर्य तो यहीं हुआ कि बच्चे खेल रहे थे अन्यथा बच्चे और खेल एक तरह से विलोम शब्द होकर रह गये है इस दौर में। होम वर्क से ऊपर आवें तो रिफरेन्स बुक्स। उनसे निपटें तो सोल्व्ड पेपर देखने होते है। यह सब तो बाद की बातें होती है। पहले तो नित्य ‘जी.के.’ बढाने के लिये छोटे बड़े बहुत सारे अंगरेजी के अखबार पढने होते है, अनेक पुस्तकें प्रतियोगिता दर्पण और प्रतिभा निखार टाइप की, पंस्तकें पढना भी आजकल के बच्चेां के लिये अनिवार्य हो गया है। इस टफ कम्पीटीषन के युग में बच्चे तो बच्चे उनके माता-पिता को भी खेलने के लिये समय नहीं मिलता। ऐसी विषम परिस्थितियों में बच्चों को खेलते देखना सुखद आष्चर्य से कम नहीं होता। मुझे यह देखकर आष्चर्य और खुषी का अनुभव हुआ तो इसलिये कि प्एाई का इतना बोझा ढोने के बाद भी हमारे बच्चे ये हॉकी, क्रिकेट और शतरंज में वर्ल्ड कप लाकर देष का गौरव बढाते है।
    दूसरा आष्चर्य यह हुआ कि जो बच्चे खेल रहे थे वे विभिन्न वर्गों के थे और बिलकुल एक यूनिट होकर खेल रहे थे। शायद उनके माता पिता को इसका इल्म नहीं रहा होगा, अन्यथा तो वे अपने नये नकोर वैल क्लीन्ड बच्चों को इन तथाकथित गन्दे (गरीब)  बच्चों के साथ खेलने ही नहीं देते। लेकिन मैने देखा कि बच्चे बड़े मनोयोग से ‘राजनीति राजनीति’ खेलने में मषगूल थे। ‘बच्चा पुराण’ से आगे बढ कर बात करें तो बात ये है कि बच्चे राजनीति का खेल कर रहे थे न कि खेल की राजनीति।
    राजनीति का खेल आज कल बहुत बड़े कैनवास पर बड़े ही वीभत्स और अष्लील तरीके से खेला जा रहा है। राजनीति के मन्दिर में ताल ठोकना पीठ थपथपाने का काम समझा जाने लगा है। लोग बाग टी.वी. पर विपक्षी सदस्य का गिरेबान पकड़ते हुए दिखाये जाने पर गर्व महसूस करते हैं। बच्चे अपने सहपाठियों को दिखाते है कि देखो देखो! वे मेरे पापा है जो पेपर वेट उठा रहे है मारने के लिये। ऐसे महान आदर्षों को ग्रहण करने के बाद जो नौजवान पीढी तैयार होने को है उस पीढी का बचपन, बचपने में ही सही, लेकिन खेल रहा था, एक बड़े कमरे में।
    बच्चों की इस बाल पंचायत में चुनाव होने को थे। अलग अलग गुटों ने अपने अपने नाम से दल बना लिये थे, जिनके वे स्वयम् भू नेता थे। माहौल चूं कि पूरा ही राजनैतिक था इसलिये हो हल्ला भी बहुत हो रहा था। मैं चूं कि अपने आप को और कुछ नहीं तो तो राजनीति का विद्यार्थी समझता था इालिये हर ऐसे मौके पर नये बछड़े की तरह अपने वे सींग उलझाने को तत्पर रहता था जो कि अभी निकले ही नहीं थे। सीधे सादे शब्दों में कहें कि मैं कौन कि मैं खॉंमखॉं मार्का टाइप मैं राजनीति का रसिया था इसलिये उस बाल संसद का रस लेने का लोभ संवरण नहीं कर सका अतः वहीं बैठ कर तन्मयता से उनकी बैठक को देखता और सुनता रहा।         
    बच्चे उम्र और अक्ल से बच्चे ही थे इसलिये बात बात में और बिना बात के भी आपस में उलझ पड़ते थे। वैसे उन्होंने यह सब कुछ अपने पथ प्रदर्षकों से सीखा हो तो कोई नयी बात नही। सूत न कपास जुलाहों में लठ्ठम लठ्ठा , राजनीति की पहचान जो बन गया है। कांग्रेस से लेकर भाजपा में और मायावती से लेकर किसी भी अ ब स पार्टी में सदाबहार फुटौवल जो चल रही है, उससे बच्चे भी अनजान नहीं होगें। प्रदेष से लेकर जिला स्तर पर एक दूसरे की टांग खिंचाई होने की बात तो ठीक है लेकिन यहां तो धोती खिंचाई भी हो जाती है। तो मूल बात यही है कि बच्चे राजनीति राजनीति और चुनाव चुनाव खेलना चाह रहे थे।
    हर बच्चा अपने आप को टिकट का दावेदार समझ रहा था और टिकट न मिलने पर ऐसे भाव खाने का अभिनय कर रहे थे जैसे कि यू.पीू के चुनावों के बाद ब्राह्मण भाव खा रहे है। लगभग सभी यानि कि क्या कांग्रेस और क्या भाजपा हर पार्टी के असन्तुष्ट और छुटभैये नेता ,तेवर दिखाने लगे थे इस दौर में। इसके अतिरिक्त किसी की छवि खराब थी तो वह अपनी पत्नि को जिसकी अन्डरस्टैंन्डिग इन बालको ने शायद कर रखी थी उसको टिकट दिलवाने पर अड़ा हुआ था। कोई प्रमुख नेता जो अपनी पार्टी का अध्यक्ष तो था ही वह अपने बच्चे को टिकट दे रहा था जिससे अन्य सदस्यों की टिकट कट रही थी। आम वक्त में तो यह धांधली चल जाती थी ल्रकिन अब बदले वक्त में वे भी बसपा में जाने का सिंहनाद कर रहे थे। नेता तर्क दे रहा था कि नेता का बेटा यदि नेता नहीं बनेगा तो कौन बनेगा नेता। लीडर का बेटा लीडर बनेगा, अध्यक्ष का बेटा अध्यक्ष बनेगा और यदि मुषर्रफ और लालूजी की तर्ज पर सोचें तो नेता के स्थान पर उसकी पत्नि का चुनाव ही जनता की पहली पसन्द होता है।
    लेकिन बात तो तब बने जब कि वर्तमान नेता वयोवृद्ध होने के बाद भी अपना पद छोड़ने की सोचे। अभी तो सभी अटलजी की तर्ज पर सोचते है कि अभी यज्ञ अधूरा है जो कि उनके बिना पूरा नहीं हो सकता और तब फिर भावी प्रधनमन्त्री के प्रबल दावेदार को बेमन से ही सही कुछ मुस्कराकर और कुछ खिसिया कर अपने पग पीछे हटाने का उपक्रम करना ही पड़ता है। इन सब बातों की गम्भीरता से अन्जान बव्वों का चुनावी खेल सहज भाव से चालू रहा।
    नेता के पुत्र को ही नेता पद देने के अकाठ्य तर्क ने एक छोटे बच्चे को भी सोचने को विवष कर दिया। वह बड़े ही भोले पन से अपने बड़े भैया को पूछ बैठा , भैया फिर  अपने राष्ट्रपिता का पुत्र क्या बना होगा ?
        अब एक चुटकला- बेटे ने पूछा, पापा पापा ! ये पंडित जी झोली डंडा उठाये कहां भागे जा रहे है।
    बसपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने के लिये। पापा ने शान्त भाव से उत्तर दिया।
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