हमने अभी अभी यहां पर एक पेपर रक्खा था। ठीक हमारे सामने टेबल पर। अभी तो हमने अखबार भी हाथ से नहीं छोड़ा है, न ही चाय का कप। दोनों हमारे हाथ में है। हम चाय पी रहे थे और अखबार देख रहे थे। बस इतने से वक्त में हमारे कमरे से, हमारी ही टेबल से, हमारी ही आंखों के सामने से हमारा ही लिखा हुआ पेपर गायब हो गया। वह पेपर जिस पर हमने अपने नये व्यंग का शीर्षक, यह सोच कर लिख रखा था कि हमारी सोच का सिरा हमारी पकड़ में रहे। वह हमारी सोच का सिरा,वह हमारा लिखा हुआ कागज आखिर हवा कैसे हो गया। सियारामजी खीजते हुए पत्नि को कोसने ही वाले थे कि पत्नि जी, अपने दबंग होने का अहसास कराते हुए मुर्की ब तुर्की उन्हीं के अन्दाज में जवाब दिया। कुछ नहीं हुआ है हवा। आप स्वयम् ही थोड़ी देर के लिये अपनी सोच से, अपने चिन्तन से, और अपनी अखबार नवीसी की उलझनों से थोड़ी देर के लिये आजाद हो गये थे। हमारी महारानी, बिजली रानी ने जरा सा अपनी आंख क्या तरेरी, आप तो जैसे अपने आप से बाहर ही आ गये।
आपने देखा कि टी.वी. बन्द हो गया है। आपने देखा कि आपके अपने हाथ के अखबार से आपका कनैक्शन कट गया है। जो आप सोच रहे थे उससे, यानि कि आपकी सोच से आपका कनेक्शन कट गया है। जो आप सोचना चाह रहे है उससे आपका कनैक्शन कट ऑफ है। आपके हाथ में पकड़ी चाय की प्याली की गरमास का आपके सुकोमल अधरों से जो बार बार कनैक्शन हो रह था वह कनैक्शन भी एकाएक कट गया। यहां तक कि आपकी पत्नि से भी सुन्दर पत्नि यानि कि मैं जो आपके सामने बैठी आजादी की सुन्दर मन भावन सुबह की ताजगी में आपके अलसाये चेहरे को निष्पलक निहार रही थी और आप जो हर चाय के घूंट के बाद मेरी ओर चोर नजरों से देख कर स्मित सी मुस्कराहट बिखेर रहे थे। आपकी उस शरारती मुस्कराहट और मेरी जवाबी मुसकराहट के लगभग हॉट सीन को भी किसी खुर्राट डायरेक्टर की तरह इस बिजली महारानी ने कट कर दिया।
जिस लमहे में हम डूबे हुए थे वह आजादी के छः दशकों की मादक स्मृतियों का रस भरा सरोवर था। सियारातजी ने भी पत्नि को खुश करने के अन्दाज में आनी बातों को मक्खन में लपेटते हुए कहा। स्मृतियों के इस सरोवर में हम जीवन भर की आजाद भावनाओं की किश्ती में सवार विचरण कर रहे थे। स्मृतियों से कनैक्शन कट से हमारी भावनाओं की कश्ती बीच सरोवर में जैसे डूब गई। एक लमहा भर के पावर कट ने हमारी आजादी से, हमारे मस्तिष्क का जीवन्त साहचर्य कट कर दिया। आश्चर्य है इसे आप इतनी जल्दी भूल गये। भूल नहीं गया। भूल गया होता तो अपने लिखे कागज के लिये इस तरह न तड़फ रहा होता। वह मेरे सृजन का ‘इनोक्यूलेशन स्टोन’ था। वह कोई पूर्व मुख्यमन्त्री द्वारा उद्घाटित विद्युत इकाई , लिफ्ट केनाल या कुछ और नहीं था जिसकी कि चार पांच सालों तक कोई खोज खबर ही न ले। व्यर्थ प्रपंच को भूल जाऊं तब भी लाख टके का सवाल यह है कि वह कागज गया कहां।
यह भी मुझे ही याद दिलाना पड़ेगा। जैसे ही बिजली महारानी की घुप्प आवाज हुई, आपको शायद पूर्वाभास हो गया होगा अतः आपने बड़े ही बेमन से अखबार टेबल पर रखा, उससे अधिक बेमन से अपनी चाय का कप अपनी अंगुलियों से आजाद किया। फिर बड़े ही मनोयोग से टेबल की दराज खोल कर अपना वह महत्वपूण दस्तावेजी कागज आपने उसी प्रकार उसके अन्दर रख दिया जैसे कि गरीबों और मुफलिसों, यानि कि आम जनता की आजादी बड़े बड़े लोगों के हाथों में, उनकी तिजोरियों, आलमारियों और कि टेबल की दराजों में बन्द रह जाती है।
श्रीमतीजी ने विजयी अन्दाज में उनकी ओर देखते हुए जिन नजरों से उन्हें देखा, वे साफ साफ सन्देशा दे रही थी कि वे सियारातजी से किसी भी तरह कम नहीं है।
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आपने देखा कि टी.वी. बन्द हो गया है। आपने देखा कि आपके अपने हाथ के अखबार से आपका कनैक्शन कट गया है। जो आप सोच रहे थे उससे, यानि कि आपकी सोच से आपका कनेक्शन कट गया है। जो आप सोचना चाह रहे है उससे आपका कनैक्शन कट ऑफ है। आपके हाथ में पकड़ी चाय की प्याली की गरमास का आपके सुकोमल अधरों से जो बार बार कनैक्शन हो रह था वह कनैक्शन भी एकाएक कट गया। यहां तक कि आपकी पत्नि से भी सुन्दर पत्नि यानि कि मैं जो आपके सामने बैठी आजादी की सुन्दर मन भावन सुबह की ताजगी में आपके अलसाये चेहरे को निष्पलक निहार रही थी और आप जो हर चाय के घूंट के बाद मेरी ओर चोर नजरों से देख कर स्मित सी मुस्कराहट बिखेर रहे थे। आपकी उस शरारती मुस्कराहट और मेरी जवाबी मुसकराहट के लगभग हॉट सीन को भी किसी खुर्राट डायरेक्टर की तरह इस बिजली महारानी ने कट कर दिया।
जिस लमहे में हम डूबे हुए थे वह आजादी के छः दशकों की मादक स्मृतियों का रस भरा सरोवर था। सियारातजी ने भी पत्नि को खुश करने के अन्दाज में आनी बातों को मक्खन में लपेटते हुए कहा। स्मृतियों के इस सरोवर में हम जीवन भर की आजाद भावनाओं की किश्ती में सवार विचरण कर रहे थे। स्मृतियों से कनैक्शन कट से हमारी भावनाओं की कश्ती बीच सरोवर में जैसे डूब गई। एक लमहा भर के पावर कट ने हमारी आजादी से, हमारे मस्तिष्क का जीवन्त साहचर्य कट कर दिया। आश्चर्य है इसे आप इतनी जल्दी भूल गये। भूल नहीं गया। भूल गया होता तो अपने लिखे कागज के लिये इस तरह न तड़फ रहा होता। वह मेरे सृजन का ‘इनोक्यूलेशन स्टोन’ था। वह कोई पूर्व मुख्यमन्त्री द्वारा उद्घाटित विद्युत इकाई , लिफ्ट केनाल या कुछ और नहीं था जिसकी कि चार पांच सालों तक कोई खोज खबर ही न ले। व्यर्थ प्रपंच को भूल जाऊं तब भी लाख टके का सवाल यह है कि वह कागज गया कहां।
यह भी मुझे ही याद दिलाना पड़ेगा। जैसे ही बिजली महारानी की घुप्प आवाज हुई, आपको शायद पूर्वाभास हो गया होगा अतः आपने बड़े ही बेमन से अखबार टेबल पर रखा, उससे अधिक बेमन से अपनी चाय का कप अपनी अंगुलियों से आजाद किया। फिर बड़े ही मनोयोग से टेबल की दराज खोल कर अपना वह महत्वपूण दस्तावेजी कागज आपने उसी प्रकार उसके अन्दर रख दिया जैसे कि गरीबों और मुफलिसों, यानि कि आम जनता की आजादी बड़े बड़े लोगों के हाथों में, उनकी तिजोरियों, आलमारियों और कि टेबल की दराजों में बन्द रह जाती है।
श्रीमतीजी ने विजयी अन्दाज में उनकी ओर देखते हुए जिन नजरों से उन्हें देखा, वे साफ साफ सन्देशा दे रही थी कि वे सियारातजी से किसी भी तरह कम नहीं है।
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