Friday, 16 March 2012

बापू का सन्देश

जागते हो कि सो रहे हो ? जाग रहा हूं बाबा! मैंने सोचा कि छेदीजी आये है। बरसात के मौसम में श्रीमतिजी के हाथ की एक चाय और पीनी नसीब होगी। मैने अपने नसीब पर खुश होते हुए देखा कि सामने छेदीजी नहीं बापू खड़े थे। बापू! यानि कि महात्मा गांधी। मैं उन्हें देख कर अचकचा गया लेकिन वे मुस्कराते रहे। यह बापू की खासियत थी कि वे हर किसी से मुस्कराते हुए मिलते थे। लोगों के आधे दुख तो उनकी मुस्कराहट से ही दूर हो जाते थे।

तुम कहते हो कि तुम जाग रहे हो। जरा अपने आपको चिकोटी काट कर देखो। एसा तो नहीं कि तुम भी इस देश के अधिकांश लोगों की तरह जागते होने का सपना देख रहे हों। मैं बिना चिकोटी काटे ही बता सकता हूं कि मैं सौ प्रतिशत जाग रहा हूं। और मैं सौ प्रतिशत सिद्ध कर दूंगा के तुम सो रहे हो। बापू ने कहा। मैं कैसे यकीन करूं कि तुम जाग रहे हो,  तुम अपने आप को खबरची कहते हो। लोगों को जागते रखने का दम भरते हो और खुद कुम्भकरणी निद्रा में मस्त रहते हो। में अपने आप को आहत महसूस कर रहा हूं। आप इस देश के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्तित्व है, हमारे आदरणीयों के लिये भी आदरणीय है,  मैं आपको क्या कहूं। जो कहना चाहते हो वह आत्म विश्वास से कहो। मेरी बातें कड़वी जरूर है, लेंकिन सत्य है। लेकिन बापू, यह भी सत्य है कि मैं अपना काम पूरी इमानदारी से कर रहा हूं। मैं कोई नीरो थोड़े ही हूं कि रोम जलता रहे और नीरो बंशी बजाता रहे। मैं कोई नेता थोड़े ही हूं कि देश जल रहा हो और मैं बेसुध सोता रहूं। यही तो दिक्कत है। जिन्हें लोग सोया हुआ समझ रहे है वे जाग रहे है। जो लोग अन्धेरों को बनाये रखना चाहते है, उन्हें और घना और भयानक करना चाहते है वे तो जागते हुए अपना काम कर रहे है। गांधी की नजर से देखो। न दिखाई  दे तो मेरा चश्मा लगाकर देखो। इस चश्मे से ‘लगे रहो मुन्ना भाई का मुरली प्रसाद’ गांधी की नजरों से दुनियां को देखने लगता है तो तुम क्यों नहीं देख सकते। देखों कि कुछ लोग किस तरह से रौशनियों की जगह पर रौशनाई फेर रहे है। पटाखों की जगह पर बम फोड़ रहे है। दीपमालाओं की जगह पर मोटरों के टायर बसों और औटो रिक्शओं को जलाये जा रहे हैं। जम्मू में तो सेवों और फलों भरे ट्रकों को जलाया जा रहा है। प्रदर्शनों और जुलूसों के स्थान पर बन्द, चक्काजाम और रेलियों की रेलमपेल मचाई जा रही है। लोग लोकतन्त्र के नाम पर लोक को लोक से लड़वा रहे है। ये निशाचरी प्रवृति के लोग जागते हुए अपने काम में मगन है और वे लोग जो लोगों को, पब्लिक को जगाने का दम भरते है, वे तो जैसे सोये हुए है।

    ठीक कहा आपने बापू। हालात दिनों दिन बिगड़ रहे है। देश के शीर्षस्थ राजनैतिक दल सीधी मुठभेड़ की मुद्रा में है। अपने अपने जादुई झोलों से वे लोग न जाने कहों कहां से नाग और नेवले निकाल रहे है। वस्तुतः उनकी लड़ाई मदारियों वाली ही है। सदियों से देश  को संकट से उबारने वाले त्यागी और तपस्वी राजनीति की भाषा बोल रहे है। देश  के हालात वस्तुतः सबको चिन्तित करने वाले है। साफ दिख रहा है कि प्रत्येक दल  के नेताओं में मतभेद ही नहीं मन भेद भी है। कहीं राष्ट्रीय  चिन्तन का नामो-निशान नहीं दिखाई देता, मतभेद भुला कर देश के लिये सोचने को कोई तैयार नहीं है। शायद ही कोई ऐसा हो जिसे कहा जाय कि उसका चिन्तन सोलह आने लोकतन्त्र और जनता के हित के लिये है। भ्रस्टाचार  जैसे मुद्दे का भी राजनीतिकरण। आज यदि गांधीजी होते तो क्या करते, इस दृष्टिकोण से कोई सोचता  भी नहीं। सच कह रहा हूं बापू कि इन दिनों आपको बहुत ही मिस कर रहा था, आज तो आपसे आंख मिलाकर बात करने में  भी शर्म महसूस हो रही है। मैं बेहद भावुक होकर  कह बैठा, गांधीजी भी शायद भावुक हो गये। बोले! यदि तुम समझते हो कि गांधी आज भी देश के लिये काम आ सकता है तो बोलो, क्या चाहते हो गांधी से। आप देश के नाम एक सन्देश दीजिये बापू। आपके सन्देश से ही इस देश के लोगों की आत्मा जाग सकती है। लोगों के दिलों में आपके लिये आज भी अगाध श्रद्धा है तो उठो! उठाओ कलम।

मैने देखा कि मेरी डायरी पर लिखा हुआ है।

बापू का इतना सन्देश। धर्म जाति से ऊपर देश।

----...----

No comments:

Post a Comment